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Friday, October 1, 2010

नारी की पुकार

हे कृष्ण धरा पर आओ
अबला की लाज बचाओ
एक दुख्रियारी गम की मारी
बिपदाओं से अब ये हारी
लेकर मन में कुछ उम्मीदें
आई है वो द्वार तिहारी
जब पांडव को बिपदा घेरा
जब द्रोपदी का था उठा बसेरा
पांचाली एक महल की रानी
जब उतर रहा था सर का पानी
जब केश पकड़ कर सभा में आई
तब तुमने आकर लाज बचाई
इस कलयुग नगरी के दुशासन
करते है अबला पर शासन
(नश्तर सी चुभती इस पीड़ा की राहत के लिए)
कुछ खुले केश के सकतों में
कुछ खो गई चिता के लपटों में

5 comments:

Surendra Singh Bhamboo said...

ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

मालीगांव
साया
लक्ष्य

हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
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खबरों की दुनियाँ , भाग्योत्कर्ष said...

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"pro

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

Patali-The-Village said...

सुन्दर प्रस्तुति.....

dr.aalok dayaram said...

आपका लेखन सराहनीय है। आभार!